har har mahadev....
संवेदनाओं के बाजार में दरिद्रता सबसे महंगी बिकने लगी है
          (क्षमा कीजियेगा अगर कुछ रास न आये तो )
एक ही तस्वीर के कई पक्ष होते हैं।

कुंडों की ढेर में  इस बालिका की एक तस्वीर ली गई है,  तस्वीर में दिख रही बालिका कोई भी हो सकती है। इसका नाम कुछ भी हो सकता है। सोनम , ममता, दीक्षा , फातिमा,आयेशा,टेरिशा या जैकलिन भी...
प्रथम दृष्टया इस तस्वीर में आपको दरिद्रता दिखती है, और आपके भीतर करुणा उपजती है जो स्वाभाविक है ! उपजनी भी चाहिए, दरिद्रता पर करुणा न उपजे तो व्यक्ति के मनुष्य कहलाने का कोई हक़ नहीं है । कहा जा सकता है कि जिस राजा के राज में इतनी दरिद्रता हो कि नन्ही मासूम बच्चियों को कूड़े  इकट्ठा करना पड़े या कूड़े में भोजन ढूंढना पड़े ! उस राजा को आडम्बरों में पैसा खर्च करने का कोई अधिकार नहीं होना चाहिए ।

सही बात है, किंतु इस तस्वीर के  दूसरे पक्ष पर नजर घुमाते है तो .....
इस तस्वीर के दूसरे पक्ष में एक अविभावक  है, जिसने अपनी बेटी को कूड़ा इकट्ठा करने के लिए हाँक दिया है। संभव है यह लड़की दो-चार या आठ-दस भाई-बहनों के बीच से हो। अविभावक  ने केवल इसे जन्म मात्र दिया है। पर क्या सचमुच उसे इसे जन्म देने का अधिकार था?

भारत को सोचना होगा कि जो अविभावक अपने एक बच्चे को भी पाल सकने की सामर्थ्य नहीं रखता, क्या उसे आठ - दस बच्चों को जन्म देने का अधिकार है ? बिलकुल  नहीं है।
दरिद्रता दूर करने का कर्तव्य केवल सत्ता का नहीं होता। इस देश की सरकारों ने पिछले 80 वर्षों में सबसे अधिक धन का व्यय इसी दरिद्रता को दूर करने में किया है, किन्तु कुछ नहीं बदला और लगता है  अगले 80 वर्षों में भी कुछ नहीं बदलेगा। हम पक्ष-विपक्ष करते रह जाएंगे, हम भाजपा-कांग्रेस करते रह जाएंगे, पर धरातल की स्थिति नहीं बदलेगी। इस धरा धाम वसुंधरा को कभी सुख नसीब नहीं होगा, जब तक मनुष्य सड़क के किनारे उगनेवाले आवारा घासों की तरह संतान उत्पन्न करता रहेगा, दुनिया की कोई ताकत भारत से दरिद्रता को नहीं मिटा सकती, गरीबी ख़त्म नहीं हो सकती ...

संतान जब माता-पिता के पुण्य का फल बनकर जन्म ले तो यशस्वी होती है, किंतु जब पिता के क्षणिक आनंद के दुष्प्रभाव के रूप में जन्म ले तो यूँ ही कूड़े के ढेर बटोरती है। यह केवल भारत का नहीं, समूचे विश्व का सत्य है।
भारत ने यदि समुद्री सुरसा के मुँह की तरह बढ़ती जनसँख्या को नियंत्रित नहीं किया , तो भारत शीघ्र ही विश्व का सबसे दरिद्र देश होगा। विकास हमेशा की तरह सिर्फ बातों में और तस्वीरों में रह जाएगी !

वैसे इस तस्वीर का एक तीसरा पक्ष भी हो सकता है। तीसरे पक्ष में है वह कैमरामैन, जिसने यह तस्वीर खींची है। संभव है यह तस्वीर केवल इसीलिए खींची गई हो, ताकि विश्व को दिखाया जा सके कि भारत कितना दरिद्र है। यह भी संभव है कि इस लड़की को तस्वीर खींच लेने भर के लिए ही बुलाया गया हो, और तस्वीर के बदले में उसे दस या बीस रुपये मिले हों। संवेदनाओं के बाजार में दरिद्रता सबसे महंगी बिकती है। लगभग डेढ़ महीने पूर्व ही हमने देखा है कि रानू मंडल की दरिद्रता को बेचकर सिनेमा ने किस तरह से अरबों की टीआरपी कमाई है। क्योंकि भारत के आधुनिक आमिर भिखारियों की बाजार में कुछ भी संभव है।

इस तस्वीर का एक चौथा पक्ष भी हो सकता  है, और इस पक्ष में है भारत की सवा अरब से ज्यादा अग्रसर जनसंख्या ! जिसकी सोच इस बात पर निर्भर करने लगी है, कि उसे क्या दिखाया जा रहा है। बाजार उसे जो दिखाता है, वह उसी को सही मान लेती है। इस देश कि दुर्गति का एक अहम् कारण यह भी है।
वैसे इस तस्वीर का एक पाँचवा पक्ष भी हो सकता  है जिसमें मैं खड़ा हूँ। पता नहीं क्यों....?